Monday, 30 March 2009
खुदा जाने
हमारे दम पे आख़िर कौन रौशन है/
यकीनन ,
मैं भी कुछ अनजान हूँ
अपनी जरूरत से ,
यकीनन ,
तुम भी हो पुर्जे
मिलों में कारखानों में /
कोई तो है
कि जो
हम सब की मेहनत का जुआरी है /
कहाँ किस मोड़ पर
इस जिंदगी से
जूझते हैं हम
कहाँ किसके लिए कोई पहेली बूझते हैं हम/
ये सब बातें
खुदा जाने
के इनकी क्या हकीक़त है,
के बस हम जानते हैं के
बहुत ग़मगीन है दुनिया ,
के इस दुनिया की सारी मुश्किलों के हल
खुदा जाने
तूफ़ान के रहते हुए
तुम जहाँ पर रुक गए थे
वो जगह चलने की थी
तुम जहाँ पर बुझ गए थे
वो सुबह जलने की थी
थक गए थे तुम जहाँ
थकना नहीं था उस जगह
उस जगह
फिर से उठानी थी
नज़र में रौशनी
औ
देखना था के उजाला
आपकी पहलू में है
तुम जरा सा थम गए थे देख कर तूफ़ान को
के और कुछ नीची पड़ेंगी रास्तों की अड़चनें
और कुछ समतल बनेगा
इस समंदर का सफर
पर हमेशा खौफ ही है
इस समंदर का,
कि जो
पार करना है तुम्हें
तूफ़ान के रहते हुए,
तूफ़ान में ही ये समंदर
सब हुनर देगा तुम्हें,
तुम जहाँ पर रुक गए हो
वो जगह चलने की है
Friday, 27 March 2009
Tuesday, 10 February 2009
तेरे बदन पे तिल
तो हमने कहा
के सुनो ......
कतार में रहो ,
अच्छे भले हो आदमी
आँखें खुली रखो ,
यूँ खामख्वाह के मत किसी खुमार में रहो ...............
तेरे बदन पे तिल कहाँ हैं
जानते हैं हम
अब तुम
हमारे काले कारोबार में रहो
सारे गुनाह खिल के तो गुलाब हो गए
अब
आज से
काँटों के इख्तियार में रहो
Sunday, 8 February 2009
धूम मचा कर चले गए
काफी देर तक्क़ल्लुफ़ में वो
चुप बैठे
पर आख़िर में
सन्नाटे से बाहर आए
धूम मचा कर चले गए/
चिट्ठी विट्ठी लिखते रहना
इतना ही बोला उनसे
दीवानों को
क्या सूझी
वो सब लौटा कर चले गए।
Saturday, 7 February 2009
धूम मचा कर चले गए
पहले तो सारा अफसाना
बतलाने बैठे
वो फिर
बात जबां तक आते आते
बात बना कर चले गए।
ऐसे चाँद सवालों पर वो
आँख नचा कर चले गए
चुप थे
फिर भी अनजाने में
शोर मचा कर चले गए
अंगडाई से पहले उनका
थोड़ा सा इठला लेना ,
उनको क्या मालूम
कहाँ वो
आग लगा कर चले गए।
सीधे साधे सब लम्हों को
वो
उलझा कर चले गए
आए तो कंधा देने पर जाने क्या मस्ती सूझी,
ढोल नगाडे लेकर बैठे
हंस कर गाकर चले गए
पहले थोडी आँख तरेरी
फिर झगडे......
मुस्काए फिर
फिर थोड़ा हौले से चौंके
फिर घबरा कर चले गए
Friday, 6 February 2009
के जितना ढूंढते हो तुम
के जितना ढूँढते हो तुम
उतना गुम नहीं हूँ मैं
बस कुछ नए हिस्सों में थोड़ा
बंट गया हूँ अब
अब भी रखता हूँ
नए वादे हथेली पे
अब भी नेजे पे सवालों के संभालता हूँ
अब ही तनहा चाँदनी में
खूब जलता हूँ
रोज जब तुम दस सवालों को उठाते हो
रोज मैं कुछ ख्वाब नन्हें
ढूंढ लाता हूँ
तुम जिन्हें मुश्किल बता कर रूठ जाते हो
मैं सौ दफा उन मुश्किलों में
सर उठाता हूँ
यहीं अक्सर
कहीं कुछ बीनता चुनता हुआ
देखो
यहीं मिल जाऊंगा मैं
जिंदगी बुनता हुआ देखो
जरा सा गौर से देखो
उफक के पास ही हूँ मैं
के जितना ढूंढते हो तुम
उतना गुम नहीं हूँ मैं
Thursday, 5 February 2009
Wednesday, 4 February 2009
अधफटे बम
पसरे हुए हैं हम
किसी उबाल की तरह ,
नए सवाल,
उठ गए थे ....
बीच बहस में
जिनका कि
लिस्ट में कहीं पे ज़िक्र नहीं था/
गणित के ऐसे खेल
जिनका कोई हल नहीं
ऐसे अजीब मेल
जिनका कोई कल नहीं
जैसे कि
सामने हों
तेरे घर की चौखटें
और रास्तों में
बम पड़े हुए हों अधफटे ;
जैसे कि
चीख कर उठें हों
एक साथ फिर
हम गिर पड़े हों
एक
निहत्थों की भीड़ में ,
पसरे हुए हों हम
किसी उबाल की तरह ....
Sunday, 1 February 2009
बीच नदी में साँस नहीं छोड़ा करते
अफसानों में
रौशन था मैं
चम-चम , चम -चम
एक वजह थी
दाँव लगा कर हम बैठे थे
एक वजह
मैं पानी को घोल रहा था
उन सब वजहों की रंगीनी गुम हो जाए
इस से पहले
मसलों को सुलझाना होगा
वो शफ्फाक अँधेरा तारी हो जाए
इस से पहले डॉट लगाना है अम्बर पे;
साँस उखड जाने से पहले खुल जाओ .....
दम है,
शायद
ये घबरा कर घुट जाए
अब भी सारे काम वहीँ हैं जस के तस
अब भी अपने हथियारों पे जीना है
अब भी टकराकर जाना है लहरों से
बीच नदी में साँस नहीं छोड़ा करते
थक कर अपनी राह नहीं मोड़ा करते
गर
जिन्दा
उस पार नदी के जाना है ..............
Friday, 30 January 2009
फॉर्म में ugly बहुत है face मेरा
इस वजह से फंस गया है केस मेरा
आदमी legal दिखूं कैसे
बताओ तुम !
नस्ल इक मुद्दा है UN के लिए
मैं जरा सा और ग्लोबल हो रहा हूँ ...........
इंडियन हूँ ,
या कोई नाइजीरियन हूँ ,
दोस्त कहता है मुझे
हल्का सा हंस के ....
नस्लवादी टिप्पणी का खामियाजा ,
और भी लोगों ने दुनिया में भरे हैं
खेल में भी ,
और कभी खिलवाड़ में भी,....
दोस्त भी भरता रहेगा खामियाजा .
औसतन लोगों से कम सुंदर हूँ मैं ,
जाओ ............
और जाकर बताओ अन्ना को (kofi annaan)
चुप करा देना कोई मसला नहीं है
रंग चेहरे का बहुत कुछ बोलता है
दूरिआं कितनीं हैं
और किस हद तलक .....
दरमियान ये कौन है हर शख्श के
के आदमी के देखने का कायदा
आज-कल भी
कई सदी पहले सा है.
वक्त
आज कल मेरे शहर ने जो बना रक्खा है मुझको,
दिख रहा होगा तुम्हें
पर वो
मेरा चेहरा नहीं है ,
मैं यहाँ उस वक्त से हूँ
जब यहाँ कोई नहीं था,
एक हैरत थी जो बढती जा रही थी दिन ब दिन
एक फुर्सत थी जो घटती आ रही थी हर तरफ़,
मेरेआगे ही तमाशे नस्ल के पैदा हुए,
मेरी आंखों में हजारों तीर हैं उस जंग के
जो लड़ी सबने मगर कोई नहीं जिन्दा रहा,
मैं यहाँ उस वक्त से हूँ
जब ज़मीं सबकी रही
मेरे आगे सैकड़ों फसलें उगीं और कट गयीं
मेरे आगे सैकड़ों नस्लें उगीं और बंट गयीं
मैंने अपनी उम्र का वो दौर देखा है यहाँ
जिसमें जर्रे से उठा है ये शहर
और एक दिन
आसमान छू के गिरा है
पत्थरों के फर्श पे
असल बात
ये जरूरतों की जो फेहरिस्त
दिखाते हो मुझे
इनमें क्या गैर जरूरी है, पता है हमको....
हमने खोले हैं सवालों को गठरिओं की तरह
हमने बस धूल हटा दी है असल बातों से..................
ये जो फैसले होते हैं अदालत में ,
ये जो डिग्रीयां बिकती हैं इश्तेहारों ,
ये जो अल्फाज़ चमकते हैं तितलिओं की तरह
ये जो की रोज छपा करते हैं अखबारों में,
ये सब पुर्जे हैं हवाओं में उड़ने के लिए
के ये पत्ते हैं फ़क़त छुपने छुपाने के लिए
के असल बात कहीं और ही ढकी है अभी ...
हमने जवाबों को तलाशा नहीं है और कहीं
हमने अल्फाज तलाशें हैं
नए मानी में;
हमने बस धूल हटा दी है असल बातों से
हमने बस चाँद हटाया है
हसीं रातों से......
Saturday, 17 January 2009
Thursday, 2 October 2008
डर की इस दीवार के बाहर ....
के मुझे तुम ढूंढ पाओगे
किसी वादी
या सहरा में ........................
के मैंने सौ नए रस्ते बना रक्खे हैं
उस जानिब
के मैंने मुट्ठियों में थाम रक्खा है
लगामों को
किसी भी दम
सफर को मैं निकल जाऊंगा सदियों तक,
के बोलो
आओगे !
मैं जा रहा हूँ एक कोहरे में
जहाँ कुछ भी नहीं dikhta /
के हाँ,
ये डर की इस दीवार के बाहर
का मंजर है
और मैंने
लौटने के वास्ते दर्रे नहीं ढूंढें
ke मैंने एक ऊँची वस्ल पे नज़रें नहीं रोकीं
के हमने ठोंक रखीं हैं
हजारों कील पे नजरें
के सदियाँ झूलती हैं
इन लकीरों पर खलाओं में
के हाँ,
ये डर की इस दीवार के बाहर
अंधेरे में
बहुत उलटी सलीबें हैं
लटकती झूलती देखो,
के इनपे ठोंक कर ख़ुद को अगर तुम आज्मोगे
तो मुमकिन है के मिल जायें
चलो ये भूल जाओ के मुझे तुम ढूंढ पाओगे
किसी वादी या सहरा में।
Thursday, 25 September 2008
खोखली बातों को भरने का मजा देखें
मेरी सब खोखली बातें
के जब तक
हम सफर में हैं
कोई तो राह चलनी है
तुम्हारे पास भी तकलीफ के काफ़ी बहाने हैं
जिन्हें तुम उँगलियों पर भी
गिना देती हो गुस्से में,
और जिनको
चुटकियों पर मैं बजाता हूँ बड़े मन से/
के अब इन
रोज़ के झगडों से हम
बस खेलते भर हैं
सफर ये रुक नहीं सकता है
इन छोटी दलीलों से
तुम्हें भी इल्म है इसका
मुझे भी जानकारी है .....
सफर में साथ हैं हम तुम
तो इतना तो यकीं भी है
के सूरज
ढल नहीं जायेगा
जल बुझ कर के कल परसों
जिसे अब हार कहते हैं
उसे तब जीत कह देंगे
के कुछ भी
तय नहीं है
अब तलक भी दरमियान अपने
किसे क्या नाम देना है
किसे क्या नाम देना है
के आओ
खोखली बातों को भरने का मजा देखें
के आओ
अपनी मर्ज़ी से गुजरने का मजा देखें
जो अंत तक परदे पे ठहरा हो
किसी बस ट्रेन या ऑटो या पैदल
जिस तरह से भी.......................
बहुत ज्यादा जलालत लोग थे कुछ
सह नहीं पाए
वो कुछ बेहतर तमाशे देखने की जिद में हैं शायद
कोई ऐसा करिश्मा जो कभी सदियों में मुमकिन हो
या शायद वो भी नामुमकिन,
जिन्हें शर्मो हया में बंद रखना था कुंवारापन
वो सब झेंप कर थोड़ा
हुए रुखसत वहाँ पर से
..................वहाँ पर से
जहाँ पर जंग जारी थी उनके पीछे
मैं उस बेशर्म बे गैरत की बातें करना चाहूँगा
जिसे कूचा गया और थूर कर फोड़ा गया पहले
अभी दो चार मिनटों में तमाशा खुलने वाला है
हमारे लंड पे बैठा हुआ मोटा सा कनगोजर
के समझो डेढ़ फुट लंबा
बहुत ही लिजलिजा चिकना......................
डर के वो लम्हे बहुत कुछ होंगे ऐसे ही
के जिन लम्हों में उनके हौसले टूटे या ना टूटे
ये उनका पर्सनल मुद्दा है छोडो ये कहानी तुम
के आख़िर तक टिके रहना भी इक अच्छी कहानी है
बहुत अच्छा फ़साना है कभी सुनने सुनाने को
मगर वो ही कहे जो अंत तक परदे पे ठहरा हो
Wednesday, 24 September 2008
hausala
किसी सुनसान बंजर में बिछा दूँगा कोई दरिया
और ऐसे ख्वाब कितने आ रहे हैं आज कल मुझको
तुम्हें कैसे बताऊँ
इन दिनों क्या बेकरारी है ...................
कभी जो लेट जाता हूँ अगर बिस्तर पे गलती से
तो मेरी आँख में कोई सवेरा बैठ जाता है
के पलकों पे उजाला आज कल कुछ कम नहीं होता
के शायद नींद कोई मिलावट हो गई होगी
तुम्हें कैसे बताऊँ दिन के मानी क्या हुए मेरे
तुम्हें कैसे बताऊँ किस गली से लौटता हूँ मैं
के मुझको सब बहुत मुमकिन सा लगता है मेरे भीतर
के मुझको सब बहुत मुमकिन सा लगता है मेरे भीतर।
उस तरफ़ आजाद हूँ
अब भी मुझको रोक लो
मुझसे सब कुछ साफ़ कहने की गुजारिश मत करो
मैं सुरीली नज़्म का छूटा हुआ इक लफ्ज़ हूँ
मैं कहूँगा, तो कहूँगा जोर से हर बात को
और भी हैं रास्तों में होश की परछाइयां
और इक दुनिया है मेरी
मैं जहाँ आजाद हूँ
और भी मेयार हैं बदले हुए मेरे कई
और भी कुछ ख्वाब हैं सुनसान में फैले हुए
क्या जरूरी है के हर इक चीज़ से पर्दा उठे
क्या जरूरी है के सब कुछ ठीक हो उस पार भी
मैं खुला तो साथ में खुल जायेंगे पत्ते कई
मैं खुला तो ज़िन्दगी खुल जायेगी हर छोर से
मैं सुरीली नज़्म को पढ़ दूँगा हर इक और से
इस तरफ़ बुलबुल हूँ मैं,
पर उस तरफ़ सैयाद हूँ
इस तरफ़ पेशी है मेरी ,
उस तरफ़ आजाद हूँ।
हमारा भी भरोसा
हम सच बताते हैं
जहाँ की बात उट्ठी है
वहाँ जाते हैं हम अक्सर,
गुजरते हैं बहुत फुर्सत से उन गलियों से कूचों से .....
बहुत तहजीब तो शायद नहीं है
हाँ मगर फिर भी .............
अब
इतनी भी नहीं नफरत
के क़त्लऐ आम हो ,
हाँ ठीक है....... के सर मिले हैं कई ठिकानों पे
और कई ठिकानों पर मिले हैं पाँव के जूते
मगर अब वो नहीं होंगे जो रहते थे वहाँ पहले
ना उनकी आत्मा होगी ना उनके जिस्म के टुकड़े
किसी गुमनाम फाइल में दबी हैं अस्थियाँ उनकी
हमारे पास
बस कुछ आंकड़े हैं कहने सुनने को
वहीँ से आए हैं हम
भाग कर भटके हुए .........
ये सब किस्से हमारी आँख के आगे हुए तो क्या
ये सब किस्से हुए
कहते हैं सुनते हैं सुनते हैं
हमारा भी भरोसा कीजिये हम सच बताते हैं।
थोड़ा मशविरा कर लें
अभी तो आसमानी रंग के परचम बनाने हैं
अभी तो आजमानी हैं हजारों ख्वाहिशें ऐसी
के जिनसे लौटने की कोई गुंजाईश नहीं होती
के पहले बैठ जायें हम जरा सा मशविरा कर लें
के किन मुद्दों पे हमको मोर्चा आगे बढ़ाना है
कहाँ तक दूर जाना है हमें इस रहे अव्वल पे
कहाँ पर झेंप जायेंगी हमारी सब्ज़ उम्मीदें
कहाँ पर जर्द हो जाएँगी साड़ी वादियाँ इक दिन
कहाँ पर तोड़ना होगा किसी चट्टान को
और फिर
कहाँ पर जोड़नी होगी किसी एहसास पे दुनिया
हमें सब सोचना होगा निकलने से बहुत पहले
के पहले बैठ जायें हम जरा सा मशविरा कर लें.
थोड़ा मशविरा कर लें
अभी तो आसमानी रंग के परचम बनाने हैं
अभी तो आजमानी हैं हजारों ख्वाहिशें ऐसी
के जिनसे लौटने की कोई गुंजाईश नहीं होती
के पहले बैठ जायें हम जरा सा मशविरा कर लें
के किन मुद्दों पे हमको मोर्चा आगे बढ़ाना है
कहाँ तक दूर जाना है हमें इस रहे अव्वल पे
कहाँ पर झेंप जायेंगी हमारी सब्ज़ उम्मीदें
कहाँ पर जर्द हो जाएँगी साड़ी वादियाँ इक दिन
कहाँ पर तोड़ना होगा किसी चट्टान को
और फिर
कहाँ पर जोड़नी होगी किसी एहसास पे दुनिया
हमें सब सोचना होगा निकलने से बहुत पहले
के पहले बैठ जायें हम जरा सा मशविरा कर लें.
Monday, 22 September 2008
painting for me.......
The indifference between nature of a being and menifestation of goodness is a point where the whole society is standing on a rock. The unshakable, well knitted, carefully designed slap on our cheeks. Ah........what a slap ! F*** them all, all those gaps we have between innocence and mastery. For me, my work is nothing but a cross section of these two worlds.
Untill you throw yourself out on the barren land, you can't imagine what hunger means. And that hunger is the origine of every calculation I scribble on my canvas.